**करोड़ों खर्च होने के बाद भी धरातल पर नहीं सुधरे हालात**
छतरपुर :-केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी आकांक्षी योजना में शामिल होने के बाद भी छतरपुर जिले के हालात नहीं सुधरे हैं। कागजों में पिछले 6 साल से छतरपुर के गले में आकांक्षी जिले का तगमा लटका हुआ है लेकिन हालात आज भी जस के तस है। विभिन्न विभागों को मिले करोड़ों रूपए तो खर्च हो गए पर धरातल पर हालात नहीं सुधरे हैं। भारी भरकम राशि खर्च होने के बाद भी रैंकिग में छतरपुर का 50वां स्थान है।
ज्ञात हो कि वर्ष 2018 में भारत सरकार के नीति आयोग में देश भर के अत्यंत पिछड़े 112 जिलों को आकांक्षी जिलों की सूची में शामिल किया था। इस सूची में छतरपुर सहित मध्यप्रदेश के भी 8 जिले शामिल है। शासन की योजनानुसार आकांक्षी जिलों को केंद्र और राज्य सरकार द्वारा प्रोत्साहित कर अन्य विकसित जिलों की श्रेणी में शामिल करने का सम्मिलित अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत् शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, ग्रामीण विकास, महिला बाल विकास जैसे प्रमुख विभागों को चिन्हित गाईडलाईन के अनुसार डेब्लप करने के लिए सरकार ने अलग-अलग समय पर अलग-अलग विभागों के लिए करोड़ों रूपए का बजट आबंटित किया। इस बजट से कृषि विभाग को सिंचाई का रकवा बढ़ाना था। उन्नत खेती को बढ़ावा देना था, फसलों के अत्याधुनिक और उन्नत बीज खरीदकर फसल का उत्पादन बढ़ाना था लेकिन पिछले 6 साल में न तो जिले में उस अनुपात में फसलों का उत्पादन बढ़ा और न हीं सिंचाई का रकवा बढ़ा जिस अनुपात में सिंचाई का रकवा बढऩा चाहिए था। यानि यहां बजट का तो भरपूर उपयोग किया गया पर धरातल पर इसका असर दिखाई नहीं दिया। यही हाल अन्य विभागों के हैं। इन 6 वर्षों के दौरान शिक्षा विभाग के प्रत्येक स्कूल में शत्-प्रतिशत विद्युतिकरण किया जाना था लेकिन आज भी दर्जनों स्कूल विद्युत विहीन है। महिला बाल विकास में भी इस योजना के बजट का बड़ा हिस्सा खर्च किया गया। पर हालातों में कोई सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में भी आकांक्षी योजना के तहत् धरातल पर कई काम किए जाने थे पर शायद वे काम कागजों में सिमिट कर रह गए।
सूत्र बताते हैं कि लगभग 4 वर्ष पहले स्वास्थ्य विभाग को डिजीटल उपकरण खरीदने के लिए तकरीबन डेढ़ करोड़ रूपए तक की राशि आबंटित की गई थी। यह राशि कब और कहां कैसे खर्च की गई प्रशासन ने कभी इस बारे में आमजन को बताना उचित नहीं समझा। सूत्र तो यहां तक बताते है कि स्वास्थ्य विभाग में जो डिजीटल उपकरण खरीदी गए थे उनकी खरीदी के लिए बहुत से दानदाताओं ने बड़ी मात्रा में दान की राशि भी दी थी। अब लोग यह नहीं समझ पाए कि डिजीटल उपकरणों की खरीददारी आकांक्षी योजना के मद में आई राशि से की गई या फिर दानदाताओं की राशि से..?
*प्रभारी का प्रभार विवादों में।*।
आकांक्षी योजना के तहत् जिला प्रशासन ने महिला बाल विकास के अधिकारी राजीव सिंह को इस योजना का जिला प्रभारी नियुक्त किया था। राजीव सिंह हमेशा ही विवादों में रहने वाले अधिकारी हैं और उन्होंने भी इस योजना के क्रियान्वयन में जमकर मनमानी की है। सूत्र बताते हैं कि कई बार उनके प्रभार को लेकर विरोध के स्वर उठे पर प्रशासन की मेहरबानी के चलते आकांक्षी जिला योजना का प्रभारी नहीं बदला गया। जबकि इस योजना का काफी बजट महिला बाल विकास विभाग में ही खर्च किया गया है। यह बजट किस मद में और कहां खर्च किया गया यह भी आज तक किसी को कोई जानकारी नहीं है।
**नरेंद्र सर्राफ अधिमान्य पत्रकार**