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बीते एक दशक से श्रम एवं पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर चल रही शराब फैक्ट्री।।

बीते एक दशक से श्रम एवं पर्यावरण नियमों को ताक पर रख कर चल रही शराब फैक्ट्री।।
दो प्रवासी मजदूरों की मौत।।
मामले में की गई कार्यवाही से उठ रहे सवाल।।

छतरपुर।। नौगांव// सरकार किसी की भी हो शराब फैक्ट्री संचालक की हौसले हमेशा बुलंद रहते हैं बीते एक दशक से श्रम,पर्यावरण एवं शराब नीति नियमों को तक पर रखकर चल रही शराब फैक्ट्री के विरुद्ध आज तक ऐसी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई जिसकी चर्चा की जा सके। शराब फैक्ट्री संचालक पूरी ताकत के साथ सिर उठाए हुए हैं जिसे शासन प्रशासन का जरा भी भय नहीं है दो प्रवासी मजदूरों की मौत के बाद पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है की फैक्ट्री संचालक के आगे क्या नेता, क्या अधिकारी और क्या पुलिस सभी नतमस्तक नजर आ रहे हैं। जिसमें मामले से जुड़े हर विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं जिसमें अधिकारियों का रवैया बहुत कुछ कहता है।

क्या सो रहा डॉक्टर मोहन यादव का श्रम विभाग।।

कहने को तो श्रमिक के हितों की रक्षा के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने बाकायदा एक श्रम मंत्रालय खोल रखा है जिसमें एक वरिष्ठ अधिकारी के नीचे जिला स्तर तक अफसर की एक लंबी फौज है और प्रत्येक जिले के श्रम विभाग का दायित्व है कि वे  मजदूरों को शोषण से बचाने व नियमानुसार  उन्हें सुविधा दिलाने के साथ उनके हितों के लिए बने तमाम श्रम कानून को लागू करवाए । अगर समय -समय पर शराब फैक्ट्री का औचक निरीक्षण किया जाता तो शायद इन दो प्रवासी मजदूरों की मौत नहीं होती। क्योंकि शराब फैक्ट्री में आवासीय परिसर की अनुमति नहीं है। और प्रवासी मजदूर फैक्ट्री के अंदर चार-पांच महीनों से  रह रहे थे। बहरहाल नियमों का पालन करने में श्रम विभाग लाचार नजर आ रहा है हादसे के बाद कागजी खानापूर्ति  किए जाने की बात की जा रही है।
शराब फैक्ट्री में मजदूरों की सुरक्षा के लिए कोई भी सुरक्षा उपकरण मौजूद नहीं है।न ही किसी प्रकार की दुर्घटना होने पर प्राथमिक उपचार की व्यवस्था है ना ही इसके लिए वहां कोई परमानेंट बाहन की व्यवस्था है। इतने बड़े शराब फैक्ट्री में मजदूरों के लिए बाथरूम करने के लिए भी कोई पेशाब घर तक नहीं है ।
क्या कहता है श्रम कानून।।
श्रम कानून के मुताबिक सभी प्रतिष्ठानों में काम करने वाले मजदूरों का पंजीयन श्रम विभाग में किया जाना चाहिए। साथ ही अंतरराज्जीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम 1979 में प्रवासी श्रमिकों को नियुक्त करने वाले सभी प्रतिष्ठानों का पंजीकरण होना अनिवार्य है। किसी भी प्रतिष्ठा का कोई भी प्रमुख नियोक्ता अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों को तब तक कम पर नहीं रख सकता जब तक कि उनके पास अधिनियम के तहत जारी पंजीकरण प्रमाण पत्र न हो साथ ही कोई भी ठेकेदार किसी राज्य में किसी भी व्यक्ति को दूसरे राज्य में किसी प्रतिष्ठान में काम करने के उद्देश्य से भर्ती नहीं करेगा जब तक की उसके पास इस अधिनियम के तहत इसके लिए लाइसेंस न हो ,अधिनियम में कहा गया है ।कि यह ठेकेदार का कर्तव्य है कि अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों को नियमित और समान मजदूरी का भुगतान हो आवासीय आवास, मुफ्त चिकित्सा भी सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है।
प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दंड।।
जो कोई भी इस अधिनियम के तहत निरीक्षक को उनके कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डालेगा उसे दो साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है या दोनों हो सकते हैं। साथ ही सभी प्रतिष्ठानों के लिए नियमों का उल्लंघन करने पर दंड और जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। प्राप्त जानकारी के अनुसार शराब कंपनी में तीन फर्मो द्वारा 60 मजदूर श्रम विभाग में दर्ज हैं जबकि लगभग डेढ़ सौ से दो सौ मजदूर इस फैक्ट्री में काम कर रहे हैं जिनका न तो पंजीयन है न ही रिकॉर्ड है। क्योंकि शराब फैक्ट्री में प्रवासी मजदूरों के हादसे के बाद उनके परिजनों से सबसे पहले आधार कार्ड भेजने को कहा था ।सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार शराब कंपनी मालिक अब रिकॉर्ड को दुरुस्त करने में लगे हुए हैं। शराब फैक्ट्री में इन सब अनियमिताओं के बाद भी शराब फैक्ट्री का संचालन शुरू हो गया है।
प्रदूषण पर अफसरों की चुप्पी।।


जिस पानी से कई गुना पैदावार बढ़ाकर किसानों को गदगद किया। वही पानी अब उन्हें खून के आंसू रुला रहा है शराब फैक्ट्री से निकलने वाला जहरीला पानी और उसका कचरा पानी के साथ बहाया जा रहा है जो किसानों की खेती को बीते कई दशकों से नुकसान पहुंचा रहा है इतना ही नहीं जल के साथ वायु प्रदूषण भी फैल रहा है जिसको लेकर दर्जनों बार शिकायत की गई प्रशासन को ज्ञापन भी ग्रामीणों ने सौंपा लेकिन सख्त कार्रवाई नहीं की गई हर बार रटा-रटाया जवाब जांच के लिए  सैंपल भेजा गया है जांच में क्या पाया गया उसका जवाब आज तक नहीं दिया गया। इस बार तो हद ही हो गई जब प्रवासी मजदूर की मौत के बाद प्रदूषण विभाग जगा और 10 साल बाद शराब फैक्ट्री से सैंपल लिए गए। जबकि हर वर्ष प्रदूषण बोर्ड की एनओसी कैसे मिलती रही है यह समझ से परे है। इस हादसे के बाद शराब फैक्ट्री के आस-पास का जायजा लिया तो पाया कि यहां एनजीटी के नियमों की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं ग्रीन बेल्ट के अलावा फैक्ट्री में प्रदूषण रोकने का कोई ठोस इंतजाम नहीं है। फैक्ट्री से निकलने वाले जहरीले पानी से कई जानवरों सहित पक्षियों की मौत हो चुकी है।


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