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स्टेडियम का बुरा हाल।। गधों और असामाजिक तत्वों का रहता है डेरा।

स्टेडियम का बुरा हाल।।
गधों और असामाजिक तत्वों का रहता है डेरा।
हैंडओवर होने से पहले पवेलियन खंडहर में तब्दील...
स्टेडियम में घुसते ही र्दुगंध के कारण सांस लेना भी मुश्किल।।
छतरपुर। जिला मुख्यालय के करीब छतरपुर से महज 3.5 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पलौठा हार में 80 लाख की लागत से बने ग्रामीण स्टेडियम में गधों के डेरे ने सरकारी महकमे की उपेक्षा व लापरवाही की सच्चाई उजागर कर दी है। पूर्व राज्यमंत्री एवं सदर विधायक ललिता यादव ने ग्रामीणों की मांग पर पलौठा हार में खेल गतिविधियों के संचालन के लिए ग्रामीण स्टेडियम मंजूर कराया था।
खेल एवं युवा कल्याण विभाग के द्वारा मिले 80 लाख के बजट से आरईएस ने शानदार स्टेडियम का निर्माण तो करा दिया। बाद में समारोहपूर्वक स्टेडियम का लोकार्पण छतरपुर की पूर्व नपा अध्यक्ष अर्चना सिंह ने कर भी दिया। यहां तक तो सब ठीक रहा पर इसके बाद शुरू हुआ स्टेडियम के प्रति सरकारी उपेक्षा और लापरवाही का काला अध्याय। जनपद पंचायत छतरपुर द्वारा पलौठा में बने इस ग्रामीण स्टेडियम के हैंडओवर की प्रक्रिया पूरी न हो पाने से न तो पंचायत को इसके रखरखाव के लिए कोई जिम्मेदारी मिल पाई न सरकार द्वारा कोई बजट दिया गया। इस तरह से काफी पहले लोकार्पित हो चुके 80 लाख के इस स्टेडियम में आज तक कोई भी ग्रामीण खेल गतिविधि नहीं हो सकी है। बस ये स्टेडियम एक शोपीस बनकर रह गया है। आज जब सर्चस्टोरी की टीम ने इसका मुआयना किया तो यहाँ जुआरी, शराबी मजमा लगाए हुए थे और शाम होते ही गांव में घूमने वाले गधे, गाय सहित अन्य जानवर इसे अपना आशियाना बनाए मिले।
स्टेडियम के मुख्य द्धार के सामने कब्रिस्तान का निर्माण हो गया है जिससे खेल मैदान का मुख्य द्धार दिखाई ही नहीं दे रहा था, हर तरफ गंदगी से सराबोर इस स्टेडियम में घुसते ही र्दुगंध के कारण सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था, जाने का रास्ता ऐसा कि सैकड़ों ट्रक गंदगी के बीच नाक बंद कर खेल मैदान तक बड़ी मुश्किल से पहुँच पाए, 80 लाख की कीमत से बनाया गया खेल मैदान धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो गया है. आलम यह है कि खेल मैदान के अंदर बने कमरों में गधों और आवारा जानवरों का कब्जा है. खेल मैदान के अंदर ना सिर्फ जंगली पेड़ पौधे उग आए हैं बल्कि खेल मैदान के अंदर बने शौचालय और अन्य कमरों को भी तोड़ फोड़ दिया गया है. इस खेल मैदान को इस उम्मीद के साथ बनाया गया था, कि गांव के बच्चे मैदान में खेलकूद करते हुए अपना शारीरिक और मानसिक विकास करेंगे, लेकिन यह हो ना सका और प्रशासनिक लापरवाही के चलते यह खेल मैदान धीरे धीरे आवारा तत्वों का अड्डा बनकर रह गया और जिम्मेदार इस ओर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं हैं.
*न जिम्मेदारी मिली न देखरेख का बजट*
दरअसल इस स्टेडियम का रखरखाव व खेल गतिविधियों के लिए इसके उपयोग की जवाबदारी का निर्वहन खेल एवं युवक कल्याण विभाग को और देखरेख ग्राम पंचायत करना थी। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि सरकारी विभागों की कागजी पेचीदगियों में उलझकर यह स्टेडियम अनदेखी का शिकार हो गया है। आरईएस विभाग द्वारा बनवाए गए स्टेडियम के हैण्डओवर की प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं हो सकी है।दरअसल छतरपुर जनपद द्वारा ग्राम पंचायत बरकौहां को इसके रखरखाव की जिम्मेदारी सौंपी जाना थी। पर सारी प्रक्रिया कागजों में अटकी होने से न तो पंचायत इसे अपने अधिकार में ले सकी न शासन द्वारा रखरखाव के लिए कोई बजट उपलब्ध कराया गया। अब यह स्टेडियम अपनी दुर्दशा की कहानी खुद कह रहा है।
*हालांकि शहर के पंडित बाबूराम चतुर्वेदी स्टेडियम* का ५ करोड़ की लागत से कायाकल्प होने के बाद स्टेडियम परिसर में पिछले 8 माह से तालाबंदी है और जिला प्रशासन का कब्ज़ा है जिससे खेल गतिविधियां बाधित है जिससे युवाओं में आक्रोश बढ़ता जा रहा है, और शीघ्र ही स्टेडियम को खोले जाने की मांग खेल प्रेमियों ने की है। वहीं पंडित बाबूराम चतुर्वेदी स्टेडियम के कायाकल्प के बाद अब राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक आयोजनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है और जिससे नए खेल मैदान की खोज की जा रही है और पलौठा के खेल मैदान को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है लेकिन यह खेल मैदान सिर्फ ग्रामीण खेल गतिविधियों और राजनैतिक आयोजनों के लिए तो उपयुक्त हो सकता है लेकिन शहर से दूर और मार्ग दुर्गम होने के कारण शहर के खेलप्रेमियों के लिए बिलकुल उपयुक्त नहीं है और पंडित बाबूराम चतुर्वेदी स्टेडियम का विकल्प तो कतई नहीं, नवागत कलेक्टर पार्थ जैसवाल जी का ध्यान आपेक्षित है.

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